Top 10 Lessons of Bhagwat Gita

Srimad Bhagavat,


भगवद गीता के प्रमुख दस उपदेश
महर्षि व्यास द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत का अभिन्न अंग है भगवद गीता, जिस में भगवन कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशो का वर्णन है, जो कि विश्व के और जीवन के अति महत्वपूर्ण दर्शन से परिपूर्ण है! भगवान कृष्ण ने अर्जुन को धर्म स्थापना के लिए शिथिल पड़ते देखा कि जब उसे अपने ही परिजनों के विरुद्ध युद्ध में शस्त्र उठाने पड़े! आसान नहीं होता है अपनों के विरुद्ध लड़ पाना चाहे कितना भी बड़ा उद्देश्य और सामाजिक कार्य उसमे निहित ना हो? ऐसे में भगवान् कृष्ण ने स्वयं अर्जुन को जीवन दर्शन से परिचित कराया और उन के द्वारा जीवन के सम्बन्ध में कही गयी सभी बातें आज के परपेक्ष में भी उतनी ही उपयोगी है जितनी कि उस समय अर्जुन के लिए थी!

इसके अध्ययन मात्र से कोई भी व्याकुल से व्याकुल जीव, जीवन की सार्थकता समझ सकता है क्योंकि इसमें कही गयी बातें शाश्वत सत्य हैं! इसके सबसे प्रमुख उपदेश निम्न हैं:

  1. आत्मा अनंत है जबकि शरीर नश्वर होता है! मृत्यु के समय आत्मा सिर्फ एक शरीर को छोड़ दूसरे शरीर को उसी प्रकार धारण करती है जैसे कि हम एक कपडे को छोड़ दूसरे कपडे को धारण करते हैं! इसलिए मृत्यु के भय को अपने दिल से  निकाल देना चाहिए!

  2. स्वार्थ बुध्दि का हरण कर लेता है क्योंकि स्वार्थी व्यक्ति सिर्फ अपने निजी स्वार्थ को ही देख पाता है उसे लोक कल्याण से कोई भी मतलब नहीं होता है! जैसे दर्पण पर धूल जम जाने से प्रतिबिम्ब साफ़ नहीं दिखाई देता वैसे ही मन पर स्वार्थ हावी होते ही बुद्धि का नाश होने लगता है!

  3. जो होता है वह अच्छे के लिए ही होता है! ईश्वर पर विश्वास रखो क्योंकि वह जो भी करता है मनुष्य के भले के लिए ही करता है! अगर हम सिर्फ इस सत्य को जीवन में जान लें कि वह परम पिता परमेश्वर हमारे साथ हर वक़्त है और उसकी इच्छा से ही सब कुछ होता है तो हमारे मन में चलने वाले अधिकांश द्वंद समाप्त हो जाएंगे! बीते हुए कल की चिंता और भविष्य में आने वाले कल के भय से हम मुक्त हो जाएंगे!

  4. हमें कभी कर्म करने से पीछे नहीं हटना चाहिए, कर्म से विमुख हो कर हम जीवन में आगे नहीं जा पाते हैं! चाहे आध्यात्मिक ज्ञान हो या  फिर मन की शांति यह बिना दायित्वों के निर्वहन के बिना प्राप्त नहीं हो सकती! जीवन लेने का उद्देश्य ही "कर्म" करना है इसलिए अपने भौतिक शरीर से जुड़े सभी दायित्वों का शुद्ध अंतर्मन से निर्वहन करना चाहिए!

  5. सुख और दुःख में लिप्त नहीं होना चाहिए! दोनों ही परिस्थियों में समरसता बनाये रखनी चाहिए! अगर हम अपने द्वारा किये गए हर कार्य से प्राप्त होने वाले सुख और दुःख से  तटस्थ हो कर कार्य करें तो हम अपने हर कार्य को वह चाहे छोटा हो या बड़ा हम अधिक ऊर्जा के साथ कर पाएंगे!

  6. इच्छाओं से ऊपर उठना चाहिए! हमारे मस्तिष्क में निरंतर अच्छे या बुरे विचार, भावनाएं या फिर इच्छाएं जन्म लेते ही रहते हैं! यह सब मन को अस्थिर करते रहते हैं और हम अपने आप को ही अच्छी तरह से नहीं देख पाते हैं इसलिए मन का शांत और बुद्धि का स्थिर होना अति आवश्यक है!

  7. संशय में रहने वाला व्यक्ति कभी भी सुखी नहीं रह पाता है! अपने आप पर या ईश्वर पर संदेह रख कर हम लगातार दुखी ही हो सकते है! महान व्यक्तियों द्वारा दी गयी शिक्षा, दर्शन और सत्य पर संदेह कर हम अपना ही अहित करते हैं और दुखी होते रहते हैं!

  8. हम इस दुनिया में ना कुछ ले कर आये हैं और ना ही यहां से कुछ भी ले कर जा पाएंगे! हम खाली हाथ ही आये थे और खाली हाथ ही इस दुनिया से जाएंगे! इसलिए हमे हर प्रकार  की "लिप्सा" से ऊपर उठना चाहिए और ज़रुरत से अधिक धन के संचय में लिप्त होने से बचना चाहिए!

  9. मृत्यु के भय को ह्रदय से निकाल देना चाहिए क्योंकि मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है! मृत्यु नश्वर चीज़ों की होती है जैसे कि शरीर जबकि निरंतर बने रहने वाली आत्मा अजर अमर होती है! इसके सिवा शरीर से जुड़े सारे सम्बन्ध और संपत्ति वगैरह सब अस्थायी हैं इसलिए इनके नाश का भय क्यों करें?

  10. चीज़ें जैसी आज हैं वैसी कल नहीं रहेंगी क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है! व्यक्ति हो या समाज या फिर हमारे आस पास का परिदृश्य समय के साथ सबका बदल जाना अनिवार्य है! इसलिए भौतिक विश्व में कहीं ठहर जाना और किसी बिंदु पर रुक जाना असंख्य समस्याओं को जन्म दे सकता है इसलिए व्यक्ति सतत जीवन में परिवर्तन को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए!

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