कर्मयोग-भगवद गीता का मनोविज्ञान

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यह सत्य है कि मनुष्य का अंतिम लक्ष्य उस परमतत्व को प्राप्त करना है, जहाँ से उसकी उत्पत्ति हुई है। लेकिन उसके लिए कर्म छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। वर्तमान समय में प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी कर्म में संलग्न है। लेकिन वह कौन-सी रीति है जिसके माध्यम से कर्ता अपने कर्म को करते हुए आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करे, यही कर्मयोग का प्रधान विषय है। 

मनुष्य जो भी कर्म करे, उसको ईश्वर को समर्पित करता रहे। इस प्रकार ईश्वर के परायण हुआ कर्मयोगी सम्पूर्ण कर्मों को करता हुआ भी परमतत्व की प्राप्ति कर सकता है। अतः मनुष्य को चाहिये कि वह ईश्वर की शरण होकर अपना प्रत्येक कर्म करे। ईश्वर के आश्रित रहकर किये जाने वाले कर्मों के अप्रत्याशित सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत यदि मनुष्य स्वयं के अभिमान के वशीभूत कर्म करता है तो उसको प्राप्त होने वाले परिणाम दोषयुक्त एवम् असंतुष्टिदायक होते हैं। अतः स्पष्ट है कि कर्म के प्रतिफल की इच्छा और कर्म के प्रति मोह दोनों का त्याग कर देना ही कर्मयोग का केन्द्र-विन्दु है। 

कर्मों में सब प्रकार के फल की इच्छा का त्याग ही स्वार्थत्याग कहलाता है। स्वार्थत्याग से दोषयुक्त कर्मों का नाश हो जाता है। गीता के अनुसार मनुष्य का केवल कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फल में कभी नहीं। कर्मयोगी वह नहीं होता जिसने क्रियाओं का त्याग कर दिया है, बल्कि वह होता है जो कर्मफल का त्याग कर केवल करने योग्य कर्म करता है।
 

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